मुंशी प्रेमचंद: प्रसिद्ध उपन्यासकार | ‘Munshi Premchand’: A Famous Novelist, Great Thinker

मुंशी प्रेमचंद हमारे देश के हिंदी और उर्दू के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे|इनका जन्म 31 जुलाई 1880 में उत्तरप्रदेश के वारणशी जिले के लमही नमक गांव के एक कायस्थ परिवार में हुआ था|इनके पिता का नाम मुंशी अजायबराय था जो लमही के एक डाकघर में डाकमुंशी थे और माता का नाम आनंदी देवी था|इनका वास्तविक नाम धनपतराय श्रीवास्तव था प्रेमचंद की आरम्भिक शिक्षा फ़ारसी में हुई जब वे 7 साल के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया और फिर 15 साल में उनकी शादी और 16 साल में उनके पिता का देहांत हो गया|यही वजह थी की उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा सौतेली माँ का व्यव्हार, बचपन में शादी, धार्मिक कर्मकांड, किसानों और क्लर्कों का दुखी जीवन यह सब 16 साल की उम्र में ही देख लिया था|उनकी बचपन से ही लिखने में रूचि रही जिसके वजह से और जीवन के  कटु अनुभव की वजह से उनके अंदर साहित्य के प्रति झुकाव झलक उठा 13 साल की उम्र में उन्होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उंऱदू के मशहूर रचनाकार रणनाथ ‘शरसार’ मिर्जा हदी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्यासों से परिचय प्राप्त कर लिया|उनका दूसरा विवाह 1906 में शिवरानी देवी से हुआ जो बाल विधवा थीं वे एक सुशिक्षित महिला थीं जिन्होंने कुछ कहानियां और प्रेमचंद घर में शीर्षक की एक पुस्तक भी लिखीं उनकी तीन संताने हुईं -श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव|

1898 में मैट्रिक की परीक्षा पास कर वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए नौकरी के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढाई भी जारी रखी 1910 में उन्होंने अंग्रेजी, दर्शन, फ़ारसी और इतिहास में इंटर किया और 1919 में अंग्रेजी, फ़ारसी और इतिहास लेकर बीए किया 1919 में बीए पास करने के पश्चात् वे शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हो गए|1921 में आरभ हुए असहयोग आंदोलन में दौरान महात्मा गाँधी के नौकरी छोड़ने के आग्रह पर 23 जून को इंस्पेक्टर के पद से इस्तीफा दे दिया फिर वे मर्यादा, माधुरी जैसे पत्रिकाओं में संपादक के पद पर कार्य किये इसी दौरान उन्होने प्रवासीलाल के एक व्यक्ति के साथ मिलकर सरस्वती प्रेस भी खरीदी तथा हंस और जागरण के नाम से हिंदी में पत्रिका निकाले प्रेस उनके लिए व्यावसायिक तौर पर लाभपरैड सिद्ध नहीं हुआ इसलिए 1903 में कर्ज़ पटाने के लिए मोहनलाल भवनानी के सिनेटोन कंपनी द्वारा कंपनी में कहानी लेखक के रूप में काम करने का प्रस्ताव स्वीकार कर कहानी लेखक के रूप में कार्य करने लगे और मुंबई आकर फिल्मो में पटकथा लिखने का कार्य करने लगे फिल्म नगरी मुंबई प्रेमचंद को ज्यादा रास नहीं आयी और वे एक वर्ष का अनुबंध तोड़कर कर तथा 2 महीने का वेतन छोड़कर वाराणसी वापस लौट आये लगातार स्वास्थ्य ख़राब होने और सुधर नहीं होने के कारन 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया उन्होंने जीवन के आखिरी समय में भी साहित्य रचना में योगदान देते हुए साहित्य रचना में लगे रहे गोदान अंतिम पूर्ण उपन्यास, महाजनी सभ्यता अंतिम निबंध, साहित्य का उद्देध्य अंतिम व्याख्यान, मंगलसूत्र अंतिम अपूर्ण उपन्यास तथा कफ़न अंतिम कहानी था|

1906 से 1936 के बीच लिखा गया प्रेमचंद का साहित्य इनके तीस वर्षों का सामाजिक सांस्कृतिक दस्तावेज है|इसमें उस दौर के समाज सुधार आंदोलनों स्वाधीनता संग्राम तथा प्रगतिवादी आंदोलनों के समाज पर प्रभाव का स्पष्ट चित्रण दिखाई देता है|इनमे बाल विवाह, पराधीनता, दहेज़, छुआछूत, विधवा विवाह, आधुनिकता, लगान, जातिवाद आदि जैसे उस समय के प्रमुख समस्याओं और सामाजिक कुरीतियों के चित्रण मिलता है|आदर्शवाद और यथार्थवाद उनके साहित्य की प्रमुख विशेषता है हिंदी साहित्य के इतिहास में 1998 से 1936 का कालखंड “प्रेमचंद युग” कहा जाता है|

साहित्यिक जीवन:-

प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन का आरम्भ 1901 से हो चूका था प्रारब्ध में वे नवाब राय के नाम से उर्दू में लिखना प्रारम्भ किये थे|प्रेमचंद की पहली रचना अप्रकाशित ही रही तथा जो उनका नाटक वो उन्होंने अपने मामाजी के प्रेम तथा उस प्रेम के फलस्वरूप उनकी पिटाई पर आधारित था|इसका जिक्र उन्होंने ने ‘पहली रचना’ नाम के अपने लेख में किया है, उर्दू भाषा में लिखी हुई उनकी पहली उपन्यास ‘असरारे मुआबीद’ है जिसे धारावाहिक के रूप में प्रकाशित किया गया|इसका हिंदी  रूपांतरण ‘देवस्थान रहस्य’ नाम से हुआ इनका ‘प्रेमा’ नाम का हिंदी रूपांतरण 1906 में प्रकाशित हुआ जिसे उर्दू में ‘हमखुर्मा व हमसवाब’ नाम है|देशभक्ति की भवन से ओतप्रोत पहला कहानी संग्रह ‘सोजे-वतन’ जो 1908 में प्रकाशित हुई अंग्रेज सरकार ने पप्रतिबन्धित कर दिया और भविष्य में लेखन न करने की चेतावनी देकर इसकी सभी प्रतियां जब्त कर ली गई|इसी वजह से उन्हें नाम बदलकर “प्रेमचंद” के नाम से लेखन कार्य करना पढ़ा इनका यह नाम दयानारायण निगण ने रखा था|दिसंबर 1910 में इनकी प्रेमचंद नाम से पहली कहानी “बड़े घर की बेटी” जमाना पत्रिका में प्रकाशित हुई|

1915 में दिसंबर के अंक में उस समय की प्रसिद्ध हिंदी मासिक पत्रिका सरस्वती में पहली बार उनकी कहानी “सौत” नाम से प्रकाशित हुई|1918 में “सेवासदन” नाम से पहला हिंदी उपन्यास प्रकाशित हुआ इसकी अत्यधिक लोकप्रियता ने प्रेमचंद को उर्दू से हिंदी का कथाकार बना दिया,उन्होंने 300 कहानियां और डेढ़ दर्जन उपन्यास लिखे हालाँकि उनकी लगभग सभी रचनाएँ हिंदी और उर्दू में ही प्रकाशित हुई हैं|

1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद वे पूरी तरह से साहित्य सृजन में लग गए कुछ महीने बाद उन्होंने मर्यादा नामक पत्रिका का संपादन किया और इसका बाद लगभग छः वर्षों तक हिंदी पत्रिका माधुरी का संपादन किया उड़ समय समाज में बेदखल करने की समस्या अधिक थी|इसी पर आधारित “प्रेमाश्रय” उपन्यास प्रकाशित किया और 1925 में “रंगभूमि” नाम का वृहद् उपन्यास के लिए उन्हें मंगलप्रसाद पारितोषिक भी दिया गया|इसके बाद उन्होंने महादेवी वर्मा के द्वार सम्पादित हिंदी मासिक पत्रिका चाँद के लिए “निर्मला” नाम के धारावाहिक उपन्यास की रचना की 1930 में उन्होंने वाराणसी में खुद का हंस नाम का मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया और 1932 में जागरण नाम का हिंदी साप्ताहिक पत्र का।इसके बाद उन्होंने लखनऊ में 1936 में आयोजित “अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखल संघ” के सम्मलेन की अध्यक्षता की 1934 में प्रदर्शित फिल्म “मजदुर” कहानी उन्होंने ही लिखी थी|

1920 से 1936 तक वे दस या अधिक कहानी प्रतिवर्ष लिखते रहे उपन्यास और कहानी के अतिरिक्त वैचारिक निबंध, सम्पादकीय, पत्र के रूप में उनका विपुल लेखन उपलब्ध है|मनरोपरांत उनकी कहानी “मानसरोवर” नाम से आठ खंडो में प्रकाशित हुई|

रचनाएँ:-

प्रेमचंद की बहुत से रचनाएँ है जिनमे उपन्यास, कहानी, नाटक, कथेतर साहित्य, संपादन शामिल है जिसकी जानकारी इस प्रकार है:-

उपन्यास:-

असरारे मुआबीद – उर्दू साप्ताहिक आवाज ए ख़ल्क़ जो 8 अक्टूबर 1903 से 1 फरवरी 1905 तक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ जो हिंदी में “देवस्थान रहस्य” नाम से प्रकाशित हुआ|

हमखुर्मा व हमसवाब 1906 में प्रदर्शित हुआ जिसका हिंदी रूपांतरण प्रेमा नाम से प्रकाशित हुआ|

किशना जो एक समालोचना थी अक्टूबर-नवम्बर 1907 के जमाना में निकली इसी आधार पर इसका प्रकाशन 1907 में ही कल्पित क्या गया|

रूठी रानी इसे 1907 में अप्रैल से अगस्त महीने तक जमाना में प्रकशित किया गया|

जलवए इसार 1912 में प्रकाशित हुआ|

“सेवासदन” 1918 में प्रकाशित पहली हिंदी उपन्यास थी यह वास्तव में मूल रूप से “बाजारे-हुस्न” नाम से पहले उर्दू में लिखा गया था लेकिन इसका हिंदी रूप सेवासदन पहले प्रकाशित हुआ|यह स्त्री समस्याओं पर केंद्रित उपन्यास है जिसमे दहेज़-प्रथा, वेश्यावृत्ति, स्त्री-पराधीनता, बाल विवाह आदि समस्याओं के कारण और इसका समाज पर प्रभाव शामिल है|

प्रेमाश्रय  यहाँ किसान जीवन पर आधारित है जो 1922 में प्रकाशित हुई इसमें अवध के किसान आंदोलन के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है|इसमें संनति व्यवस्था के साथ किसानो के अन्तर्विरोधों को केंद्र रख कर उसके चारो ओर होने वाले हर सामाजिक दबके का जमींदार, उनके नौकर, तलुककेदार, पुलिस सरकारी मुलाजिम, शहरी मध्यवर्ग और उनकी सामाजिक भूमिका का सजीव चित्रण मिलता है|

रंगभूमि 1925 में प्रकाशित हुई जिसमे एक अंधे भिखारी सूरदास को कथा का नायक बनाकर हिंदी कथा साहित्य में क्रन्तिकारी बदलाव का सूत्रपात करते हैं|

निर्मला 1925 में प्रकाशित हुई जिसमे बाल विवाह, अमल विवाह की समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है|

कायाकल्प यह 1926 में प्रकाशित हुई|

अहंकार इसका प्रकाशन कायाकल्प के साथ ही 1926 में हुआ|

प्रतिज्ञा जो 1927 में प्रकाशित हुई जिसमे विधवा जीवन तथा उसकी समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है|

गबन यह उपन्यास 1928 में प्रकाशित हुई जो रामनाथ व उसकी पत्नी जालपा के दांपत्य जीवन, रामनाथ द्वारा सरकारी दफ्तर में गबन, जालपा का उभरता व्यक्तित्व आदि घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है|

कर्मभूमि यह 1932 में प्रकाशित हुई जो छुआछूत जैसे सामाजिक बुराई पर आधारित है जिसमे  उन्होंने मंदिर में प्रवेश तथा लगान  आदि की समस्याओं को उजागर किया गया है|

“गोदान” यह 1936 में प्रकाशित हुई जो प्रेमचंद अंतिम पूर्ण उपन्यास है जो किसान जीवन पर लिखी अद्वितीय रचना है|

मंगल सूत्र यहाँ अंतिम अपूर्ण उपन्यास है जिसे उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया इसके प्रकाशन के सन्दर्भ में यह माना जाता है कि इसका प्रकाशन लेखक के देहांत के अनेक वर्शन बाद 1948 में हुआ|

कहानी:-

प्रेमचंद के अधिकतर कहानियों में निम्न व माध्यम वर्ग का चित्रण मिलता है| प्रेमचंद ने सम्पूर्ण हिंदी व उर्दू कहानियां मिलकर लगभग 300 कहानियां लिखी जिनमे 3 अभी अप्राप्त है|देशभक्ति की भवन से ओतप्रोत पहला कहानी संग्रह ‘सोजे-वतन’ जो १९०८ में प्रकाशित हुई, अंग्रेज सरकार ने प्रतिबन्धित कर दिया और भविष्य में लेखन न करने की चेतावनी देकर इसकी सभी प्रतियां जब्त कर ली गई| कानपूर से प्रकाशित होने वाली उर्दू मासिक पत्रिका ज़माना के अप्रैल अंक में प्रकाशित सांसारिक प्रेम और देश-प्रेम(इश्क़े दुनिया और हुब्बे वतन) वास्तव में उनकी पहली प्रकाशित कहानी है उनकी कुछ कहानियां नीचे दी गई है :-

  1. अन्धेर
  2. अनाथ लड़की

  3. अपनी करनी

  4. अमृत

  5. अलग्योझा

  6. आख़िरी तोहफ़ा

  7. आखिरी मंजिल

  8. आत्म-संगीत

  9. आत्माराम

  10. दो बैलों की कथा

  11. आल्हा

  12. इज्जत का खून

  13. इस्तीफा

  14. ईदगाह

  15. ईश्वरीय न्याय

  16. उद्धार

  17. एक ऑंच की कसर

  18. एक्ट्रेस

  19. कप्तान साहब

  20. कर्मों का फल

  21. क्रिकेट मैच

  22. कवच

  23. क़ातिल

  24. कोई दुख न हो तो बकरी खरीद ला

  25. कौशल़

  26. खुदी

  27. गैरत की कटार

  28. गुल्‍ली डण्डा

  29. घमण्ड का पुतला

  30. ज्‍योति

  31. जेल

  32. जुलूस

  33. झांकी

  34. ठाकुर का कुआं

  35. तेंतर

  36. त्रिया-चरित्र

  37. तांगेवाले की बड़

  38. तिरसूल

  39. दण्ड

  40. दुर्गा का मन्दिर

  41. देवी

  42. देवी – एक और कहानी

  43. दूसरी शादी

  44. दिल की रानी

  45. दो सखियाँ

  46. धिक्कार

  47. धिक्कार – एक और कहानी

  1. नेउर

  2. नेकी

  3. नब़ी का नीति-निर्वाह

  4. नरक का मार्ग

  5. नैराश्य

  6. नैराश्य लीला

  7. नशा

  8. नसीहतों का दफ्तर

  9. नाग-पूजा

  10. नादान दोस्त

  11. निर्वासन

  12. पंच परमेश्वर

  13. पत्नी से पति

  14. पुत्र-प्रेम

  15. पैपुजी

  16. प्रतिशोध

  17. प्रेम-सूत्र

  18. पर्वत-यात्रा

  19. प्रायश्चित

  20. परीक्षा

  21. पूस की रात

  22. बैंक का दिवाला

  23. बेटोंवाली विधवा

  24. बड़े घर की बेटी

  25. बड़े बाबू

  26. बड़े भाई साहब

  27. बन्द दरवाजा

  28. बाँका जमींदार

  29. बोहनी

  30. मैकू

  31. मन्त्र

  32. मन्दिर और मस्जिद

  33. मनावन

  34. मुबारक बीमारी

  35. ममता

  36. माँ

  37. माता का ह्रदय

  38. मिलाप

  39. मोटेराम जी शास्त्री

  40. र्स्वग की देवी

  41. राजहठ

  42. राष्ट्र का सेवक

  43. लैला

  44. वफ़ा का ख़जर

  45. वासना की कड़ियॉँ

  46. विजय

  47. विश्वास

  48. शंखनाद

  49. शूद्र

  50. शराब की दुकान

  51. शान्ति

  52. शादी की वजह

  53. शान्ति

  54. स्त्री और पुरूष

  55. स्वर्ग की देवी

  56. स्वांग

  57. सभ्यता का रहस्य

  58. समर यात्रा

  59. समस्या

  60. सैलानी बन्दर

  61. स्‍वामिनी

  62. सिर्फ एक आवाज

  63. सोहाग का शव

  64. सौत

  65. होली की छुट्टी

  66. नम क का दरोगा

  67. गृह-दाह

  68. सवा सेर गेहुँ नमक का दरोगा

  69. दुध का दाम

  70. मुक्तिधन

  71. कफ़न

कहानी संग्रह-

  1. सप्तसरोज – 1917 में इसके पहले संस्करण कि भूमिका लिखी गई, इसमें उनकी सात कहानियां है जैसे कि बड़े घर कि बेटी, सौत, सज्जनता का दंड, पंच परमेश्वर, नामक का दरोगा, उपदेश तथा परीक्षा आदि|
  2. नवनिधि – इसमें प्रेमचंद के नौ कहानियों का संग्रह है जैसे राजा हरदौल, रानी सारन्धा, मर्यादा कि देवी, पाप का अग्निकुंड, जुगनू की चमक, धोखा, अमवस्या कि रात्रि, ममता, पछतावा आदि|
  3. प्रेमपूर्णिमा
  4. प्रेम-पच्चीसी
  5. प्रेम-प्रतिमा
  6. प्रेम-द्वादशी
  7. समरयात्रा – प्रेमचंद के इस संग्रह में 11 राजनीतिक कहानियां हैं जैसे जेल, क़ानूनी कुमार, पत्नी से पति, लांछन, ठाकुर का कुआँ, शराब की दूकान, जुलुस, आहुति, मैकू, होली का उपहार, अनुभव, समरयात्रा आदि|
  8. मानसरोवर – इसमें भाग एक व दो और कफ़न है उनकी मृत्यु के बाद “मानसरोवर” शीर्षक से आठ भागों में प्रकाशित हुई|

नाटक:-

  1.  संग्राम – जो 1923 में प्रकाशित हुई जिसमे किसानों के बीच में व्याप्त कई प्रकार के कुरीतियों तथ किसानों के फ़िजूलखर्चों के कारण कर्ज़ और कर्ज़ न चूका पाने के कारण अपनी फसल को काम दाम में बेचने जैसी समस्याओं पर विस्तार से चित्रण और विचार करने वाला नाटक है|
  2. कर्बला – यह 1924 में प्रकाशित हुई|
  3. प्रेम की देवी – यहाँ 1933 में प्रकाशित हुई|

कथेतर साहित्य:-

  1. प्रेमचंद – (विविध प्रसंग) – यह अमृतराय द्वारा सम्पादित प्रेमचंद की कथेतर रचनाओं का संग्रह है इसके प्रथम भाग में प्रेमचंद के वैचारिक निबंध, सम्पादकीय इत्यादि प्रकाशित है तथा दूसरे भाग में प्रेमचंद के पत्रों का संग्रह है|
  2. प्रेमचंद के विचार – 3 भागों में प्रकाशित इस संग्रह में भी प्रेमचंद के अलग-अलग निबंधों, सम्पादकीय, और टिप्पणियों इत्यादि का संग्रह है|
  3. साहित्य का उद्देश्य – यहाँ इनका निबंध-संकलन है जिसमे कुल 40 लेख हैं|
  4. चिट्ठी-पत्री – यह प्रेमचंद के पत्रों का संग्रह है, दो भागों में प्रकाशित इस पुस्तक के पहले भाग के संपादक अमृतराय और मदनगोपाल हैं|इस पुस्तक में उन्होंने दयानारायण निगम, जयशंकर प्रसाद और जैनेन्द्र आदि समकालीन लोगों से हुए पत्र व्यवहार संगृहीत हैं तथा दूसरा भाग अमृतराय ने सम्पादित किया है|

प्रेमचंद के कुछ निबंधों की सूचि इस प्रकार हैं :-

  1. पुराना जमाना नया जमाना
  2. स्वराज के फायदे
  3. कहानी कला(१,२,३)
  4. कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार
  5. हिंदी-उर्दू की एकता
  6. महाजनी सभ्यता
  7. उपन्यास
  8. जीवन में साहित्य का स्थान

अनुवाद:-

प्रेमचंद एक अच्छे और सफल अनुवादक थे उन्होंने दूसरी भाषाओँ के जिन लेखकों के लेख पढ़े और जिनसे प्रभावित हुए, उसी तरह उनकी कृतियों का अनुवाद भी किया| उन्होंने ‘टॉलस्टॉय की कहानियां’ (1923), गाल्सवर्दी के तीन नाटकों का हड़ताल (1930), चांदी की डिबिया(1931) और न्याय (1931) नाम से अनुवाद किये रतननाथ सरशार के उर्दू उपन्यास फ़सान-ए-आज़ाद का हिंदी अनुवाद आज़ाद कथा बहुत मशहूर हुआ|

विविध:-

  1.  बाल साहित्य – रामकथा, कुत्ते की कहानी, दुर्गादास
  2. विचार – प्रेमचंद: विविध प्रसंग, रेमचन्द के विचार(तीन भागों में)

संपादन:-

प्रेमचंद ने हंस तथा जागरण नमक मासिक साहित्यक पत्रिका का संपादन किया था| उन्होंने सरस्वती नाम का प्रेस भी चलाया वे जमाना नाम की उर्दू पत्रिका में नवाबराय के नाम से लिखते थे|

विचारधारा:-

प्रेमचंद साहित्य की वैचारिक यात्रा आदर्शवाद तथा यथार्थवाद की ओर उन्मुख है| सेवासदन के दौर में यथार्थवादी समस्याओं का चित्रण भी कर रहे थे तो दूसरी तरफ एक आदर्शवादी की तरह उसका एक आदर्श समाधान भी निकाल रहे थे|1936 तक उनकी गोदान, कफ़न और महाजनी सभ्यता जैसी रचनाएँ अत्यधिक लोकप्रिय और यथार्थपरक हो गयीं, लेकिन उसमे समाधान नहीं बताया गया अपनी वैचारिक यात्रा को उन्होंने आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहा है|वे स्वाधीनता संग्राम के सबसे बड़े कथाकार थे|अतः इस प्रकार उन्हें राष्ट्रवादी भी कहा जा सकता है|प्रेमचंद मार्क्सवादी भी थे तो एक तरफ मानवतावादी भी तथा प्रेमाश्रय के दौर से ही उन्हें प्रगतिवादी विचारधारा आकर्षित कर रही थी|इस प्रकार उन्होंने 1906 में प्रगतिवादी लेखक संघ के पहले सम्मलेन को सभापति के रुप में सम्बोधित भी किया और उनका यही भाषण प्रगतिशील आंदोलन के घोषणा पत्र का आधार भी बना इसी अर्थ में ये कह सकते हैं कि वे ही हिंदी के पहले प्रगतिशील लेखक थे|

प्रेमचंद सम्बन्धी रचनाएँ

जीवनी

१ प्रेमचंद घर में – 1944 में प्रकाशित पुस्तक में प्रेमचंद की दूसरी दूसरी पत्नी शिवरानी द्वारा लिखी गई थी, जिसमे उनके व्यक्तित्व के घरेलु पक्ष पर प्रेमचंद घर में – 1944 में प्रकाशित पुस्तक में प्रेमचंद की दूसरी दूसरी पत्नी शिवरानी द्वारा लिखी गई थी, जिसमे उनके व्यक्तित्व के घरेलु पक्ष पे प्रकाश डाला गया है 2005 में उनके नाती प्रबोध कुमार ने इस पुस्तक का संशोधित संस्करण प्रकाशित किया|

२ प्रेमचंद कलम का सिपाही – 1962 में प्रकाशित प्रेमचंद के पुत्र आमत्रिराय द्वारा लिखी गई वृहद् जीवनी थी जिसे प्रामाणिक बनाने के लिए उन्होंने प्रेमचंद के पत्रों का बहुत उपयोग किया है|

३ कलम का मजदूर: प्रेमचंद – 1964 में प्रकाशित इस कृति की भूमिका ये है कि यह 29 मई 1962 में लिखी गई लेकिन इसका प्रकाशन बहुत सालों बाद हुआ यह प्रेमचंद के परिवार के बहार के व्यक्ति द्वारा रचित प्रेमचसंद कि जीवनी है|प्रेमचंद घर में – 1944 में प्रकाशित पुस्तक में प्रेमचंद की दूसरी दूसरी पत्नी शिवरानी द्वारा लिखी गई थी जिसमे उनके व्यक्तित्व के घरेलु पक्ष पे प्रकाश डाला गया है|2005 में उनके नाती प्रबोध कुमार ने इस पुस्तक का संशोधित संस्करण प्रकाशित किया|

प्रेमचंद की  सिनेमा में भूमिका:-

प्रेमचंद हिंदी सिनेमा के सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्यकारों में से एक हैं,सत्यजीत राय द्वारा इनकी दो कहानियों पर यादगार फिल्म भी बनायीं जा चुकीं है जो 1977 में शतरंज के खिलाडी और 1981 में सद्गति है|प्रेमचंद के निधन के दो वर्ष बाद 1938 में सुब्रमण्यम ने सेवासदन उपन्यास पर फिल्म बनायीं 1977 में कफ़न पर आधारित तेलुगु फिल्म “ओका ऊरी कथा” मृणाल सेन द्वारा बनायीं गई जिसे तेलुगु फिल्म का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला 1963 में गोदान और 1966 में गबन उपन्यास पर फ़िल्में भी बनी जो बहुत ही लोकप्रिय हुई और टीवी धारावाहिक निर्मला जो १९८० में बनी जो बहुत लोकप्रिय हुआ था|

स्मृतियाँ:-

भारतीय डाक विभाग की तरफ से प्रेमचंद की स्मृति में 30 जुलाई 1980 में उनकी जन्म वर्ष की 100वीं वर्ष के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का डाक टिकट जारी किया गया|उन्होंने गोरखपुर के जिस स्कूल में शिक्षक के पद पर नौकरी की, वहां प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई|उनकी जन्म की 125वीं सालगिरह पर सरकार की तरफ से घोषणा की गई कि वाराणसी से लगे,इस गांवों में प्रेमचंद के नाम से एक स्मारक और शोध तथा अध्ययन संस्थान बनाया जायेगा|

मुंशी प्रेमचंद के जीवन में समस्याएं बहुत थी लेकिन उन्होंने उन्हीं समस्याओं के बारे में लिखते हुए कई उपन्यास, कहानी, निबंध के माध्यम से समाज में व्यापत समस्या, बुराइयों का चित्रण किया| हम सबके जीवन में भी समस्या आती है लेकिन इससे हमे पीछा न छुड़ा कर उसका सामना करते हुए जीवन में आगे बढ़ना चाहिए|
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