स्वामी विवेकानंद: युवाओं के प्रेरणा स्रोत। A Biography Of Youth Ideal and Inspiration

स्वामी विवेकानंद 1893 के विश्व धर्म परिषद् में

आप सभी 1893 में शिकागो विश्व धर्म सभा के बारे में पढ़े होंगे। उस समय यूरोप में हम भारतियों को बड़ी हीनता की दृष्टि से देखा जाता था। लेकिन हमारे देश के एक युवा ने बेबाक भाषण दिया था जिसने हमारे देश और हमारी भारतीय संस्कृति का बखान किया तो वहां उपश्थित सभी लोग मंत्र मुग्ध हो गए। शिकागो विश्व धर्म सभा के अध्यक्ष गिबन्स ने उनसे अनुरोध किये उसके बाद उस युवा ने आगे बोलना शुरू किया और 20  मिनट से अधिक समय तक बोले। उनसे हजारो लोग अभिभूत हो गए और उनके शिष्य ही बन गए।

वो युवा थे स्वामी विवेकानंद जी… जी हाँ विवेकानंद के बारे में सभी जानते हैं लेकिन उनके बारे में विस्तार से जानकारी आप में से किसी को ही होगी।इसलिए हम आज हमारे देश के इस युवा के बारे में बताने जा रहें हैं जिन्होंने हमारी संस्कृति के ऊपर भाषण देते हुए हमारे सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था।

जन्म और प्रारंभिक जीवन:

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12  जनवरी, 1863  को कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार  सूर्योदय से  6 मिनट पूर्व 6 बजकर 33  मिनट और 33  सेकंड में हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त कलकत्ता के हाईकोर्ट में  एक प्रसिद्ध वकील थे। पहले उनका नाम दुर्गादास रखने पर विचार किया गया लेकिन अन्नप्रासन संस्कार के समय उनकी माता भुवनेश्वरी देवी को आये स्वप्न की कारण उनका नाम नरेंद्र नाथा रखा गया। उनके दादा दुर्गाचरण दत्त 25 वर्ष की उम्र में घर परिवार छोड़ कर सन्यासी हो गए वे संस्कृत और फ़ारसी के विद्वान थे।

स्वामी विवेकानंद की माता धार्मिक विचारों वाली महिला थीं इसका उनके जीवन को बहुत प्रभावित किया और स्वामी विवेकानंद शुरू से ही तेज थे जो उनके धार्मिक व्यक्तित्व और उनके पिता के कारण उन्हें तर्क संगत व्यक्तित्व तो आकर देने में सहायक सिद्ध हुआ। बचपन से ही ही नरेंद्र बहुत ही कुशाग्र बुद्धि के थे और साथ ही वो नटखट भी बहुत थे। जब भी उन्हें मौका मिलता तो वो शरारत करने से नहीं चूकते थे। चूँकि उनके घर में नितप्रतिदिन नियम पूर्वक पूजा-पाठ होती रहती थी जिसके वजह से उनमे धार्मिकता और भी गहरी होती गयी। उनके घर में हमेशा महाभारत , रामायण, पुराण जैसे ग्रंथों का वाचन होता रहता था। आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण की वजह से ही उनके मन में बचपन से अध्यात्म और धर्म के संस्कार और भी गहरे होते गए।

माता-पिता के धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कारों की वजह से ही उनके मन में ईश्वर को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा उठने लगी। ईश्वर के बारे में जानने की प्रबल उत्सुकता वश वो कभी-कभी अपने माता-पिता से और कथावाचन करने आये कथावाचक से ऐसे प्रश्न पूछ बैठते जिससे उनके माता-पिता और कथावाचक भी सोच में पड़ जाते थे। जब भी कभी वो अधिक शरारत करते थे उनकी माता उन्हें शिव-शिव बोल कर उनके ऊपर जल डाल देती थी और बालक नरेंद्र नाथ शांत हो जाते थे।

पिता पाश्तात्य सभ्यता के विश्वास रखने वाले थे और नरेंद्र दत्त को अंग्रेजी शिक्षा देना चाहते थे लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और खास सोच रहा था। नरेंद्र दत्त को योग, प्राणायाम, व्यायाम जैसे चीजों में अति-विशेष रूचि थे।

शिक्षा का आरम्भ:

नरेंद्र दत्त का ईश्वर चंद्र विद्या सागर के मेट्रोपोलिटन संसथान में वर्ष 1871 में आठ साल की उम्र में दाखिला हुआ जहाँ से उनकी स्कूली शिक्षा का आरम्भ हुआ। 1879 में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीज़न आने वाले वे पहले एक मात्रा छात्र थे।

उन्हें दर्शन , इतिहास, सामाजिक विज्ञा, कला , धर्म और साहित्य में गहरी रूचि थे , इसके अतिरिक्त उन्हें वेद, गीत, महाभारत, रामायण, उपनिषद, जैसे पुराणों और ग्रंथों में गहरी आस्था के साथ गहरी रूचि थी। नरेंद्र दत्त को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया। उन्होंने पश्चिमी दर्शन, पश्चिमी तर्क और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली कॉलेज से किया। वर्ष 1881 में ललित कला और 1884 में कला स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण किये। जनरल असेंबली कॉलेज के अध्यक्ष विलियम हेस्टी का कहना था –

“नरेंद्र नाथ दर्शन शास्त्र के अतिउत्तम छात्र हैं। जर्मनी और इंग्लॅण्ड के सरे विश्वविद्यालयों में नरेन्द्रनाथ जैसा मेधावी छात्र नहीं है।”

अनेक बार उन्हें श्रुतिधर (विलक्षण स्मृति वाला) भी कहा गया।

आध्यात्मिक शिक्षा:

श्रीरामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर में एक ईशवर प्राप्त व्यक्ति थे। वे माँ काली के बहुत बड़े उपासक थे, केवल छार वर्षों में ही उन्हें माँ काली का साक्षात्कार हो गया था जो उनके अतः करण की विकलता से ही संभव हुआ। उन्होंने राममार्गी साधुओं से राम मात्रा की दीक्षा की और राम नाम जपने में व्यस्त हो गए जिसके पश्चात् भगवान श्री राम का सा साक्षात्कार हुआ।

गुरु-शिष्य मिलन:

जब नरेंद्र दत्त अपने नाना के घर एमए की पढाई करते वक़्त अकेले रह कर अध्ययन कार्य कर रहे थे। तब एक बार श्री रामकृष्ण परमहंस अपने एक भक्त के यहाँ आये और रुके जहाँ पर सत्संग हो रहा था।जब भजन के लिए नरेंद्र दत्त को वहां बुलाया गया तो नरेंद्र का भजन सुनकर श्रीरामकृष्ण परमहंस समाधि में लीन हो गए। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो उन्होंने नरेंद्र को दक्षिणेश्वर जाते-जाते अपने पास बुलाया और नरेंद्र के हाथ अपने हाथ में लेकर बोले – तू दक्षिणेश्वर जरूर आना और इस पर विवेकानंद ने हाँ भी कर दिया।

एक बार स्वामी विवेकानंद माघ की सार्ड रात में ईश्वर में चिंतन कर रहे थे तब उन्हें विचार आया कि ईश्वर प्राप्ति के बारे में पूछने का तो उन्हें याद आया कि रविंद्रनाथ टैगोर के पूज्य पिता श्री देवेन्द्रनाथ ठाकुर गंगा नदी में नाव पर बैठ कर साधना कर रहे हैं तो चल कर उन्ही से पूछा जाये। वे तुरंत ही गंगा घाट गए और नदी में तैरकर ही नाव तक पहुँच गए। इसके बाद उन्होंने उनसे पूछा कि आप इतने समय से पवित्र गंगा में रहते हुए साधना कर रहे हैं, तो क्या आपको ईश्वर का साक्षात्कार हुआ? महर्षि नरेंद्र के प्रश्न का स्पष्ट जवाब नहीं दे सके और उन्होंने नरेंद्र से केवल इतना ही कहा कि तुम बहुत बड़े योगी बनोगे।फिर नरेंद्र ने कहा महर्षि मेरी बात छोड़िये क्या आपको ईश्वर के दर्शन हुए? इस बात का महर्षि के पास कोई जवाब नहीं था। उसके बाद नरेंद्र अपने कमरे में आकर फिर से सोचने विचरने लगते हैं कि महर्षि जैसे व्यक्ति को इतने दिनों ईश्वर का साक्षात्कार नहीं हुआ तो मेरे जैसे कि क्या बात।

दूसरे दिन सुबह उन्हें श्री रामकृष्ण परमहंस की याद आई और वे दक्षिणेश्वर चले गए। वहां जाते हुए उन्होंने देखा कि श्री रामकृष्ण भक्तों से घिरे हुए हैं और चर्चा कर रहें हैं। जैसे ही उन्होंने ने नरेंद्र को देखा वो बहुत ही प्रसन्न हुए और फिर कहा – तू आ गया, बहुत अच्छा किया। लेकिन नरेंद्र ने सीधे प्रश्न करते हुए पूछा कि क्या आपने ईश्वर को देखा है ? तो श्रीरामकृष्ण ने कहा हाँ देखा है और मई तुम्हे भी दिखा सकता हूँ। इसके बाद नरेंद्र को श्रीरामकृष्ण ने अपना शिष्य बना लिया और 1881 से 1886 तक नरेंद्र उनके साथ कई रातें दक्षिणेश्वर में साधना करते हुए बितायी।  इस प्रकार श्री रामकृष्ण के सानिध्य में आकर उन्हें आत्मा साक्षात्कार हुआ उस समय नरेंद्र कि आयु सिर्फ 25 वर्ष थी। नरेंद्र श्रीरामकृष्ण के शिष्यों में सबसे प्रिय और सर्वोपरि थे। फिर नरेंद्र 25 वर्ष कि आयु में गेरुवा वस्त्र धारण कर सन्यास ले लिए और विश्व भ्रमण पर निकल पड़े।इस तरह नरेंद्र अपने गुरु श्रीरामकृष्ण से मिले और उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार हुआ।

देश का पुनर्निर्माण:

जब स्वामी विवेकानंद के गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस का निधन हुआ उसके बाद उन्होंने स्वयं को चिंतनरूपी सागर के डुबाने की चेष्टा भी की लेकिन जल्दी ही उसका त्याग कर भारत की कारुणिक निर्धनता का साक्षात्कार करने और देश के पुनर्निर्माण के लिए भारत के पुनर्निर्माण के लिए पुरे भारत में पैदल ही भ्रमण किया इसके लिए उन्हें कई-कई दिन भूखे भी रहना पड़ा था। अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस के समाधि में लीन होने के बाद और 1886 से भ्रमण करते हुए कई राजाओं, दलितों के यहाँ अतिथि बनकर रहे। उनकी अखंड भारत भ्रमण की महान यात्रा कन्याकुमारी में ख़त्म हुई जहाँ उन्हें ज्ञान हुआ कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण के ओर रुझान वाले वैरागियों और सभी आत्माओं और विशेष कर जनसाधारण की सुप्त दिव्यता को जागृत करके ही देश में प्राणों का संचार किया जा सकता है।

विश्व धर्म सभा में भाषण:

स्वामी विवेकानंद भारत का पुनर्निर्माण के लिए तत्पर होकर भारत और दुनिया के अलग-अलग  जगहों का भ्रमण करने लगे। इसी उद्देश्य ने उन्हें 11 सितंबर, 1893 में अमेरिका के शिकागो में होने वाले विश्व धर्म सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधि बनकर जाने के लिए प्रेरित किया। उस समय यूरोप में भारतियों को हीनता की दृष्टि से देखा जाता था और वे बिना निमंत्रण ही वहां पहुँच गए इसलिए उनको वहां बोलने के लिए रोकने की बहुत प्रयास किया गय।  यूरोपीय वर्ग को भारत के नाम से ही घृणा थी उनका सोचना था कि एक पराधीन भारत भला क्या धर्म सभा में सन्देश देगा। परन्तु एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से स्वमी जी को बोलने का मौका मिला।

जब स्वामी जी ने बोलना शुरू किया तो उस धर्म परिषद् में उनके विचारों को सुनकर सभी आश्चर्य चकित हो गए।  स्वामी जी ने वहां भारत और हिन्दू सनातन धर्म की भव्यता का ऐसा प्रभाव छोड़ा कि अमेरिका को यहाँ मानना पड़ा उनसे स्वीकार किया कि भारत ही जगद्गुरु था और रहेगा। स्वामी विवेकानंद ही हैं जिन्होंने ने हिन्दू धर्म को विश्व मंच पर सार्वभौमिक पहचान दिलवाया।

जैसे ही स्वामी जी ने  “मेरे अमेरिकी भाइयों और  बहनो!” करके सभा को सम्बोधित किया उनके मुँह से यह शब्द सुनते ही तालियों की करतल ध्वनि से उनका स्वागत हुआ। वहां उपस्थित सभी लोग पुरे ध्यान से मंत्र मुग्ध होकर उनके भाषण को सुनते रहे और समय कब ख़त्म हो गया इसका पता ही नहीं चला।विश्व धर्म सभा के अध्यक्ष गिबन्स के अनुरोध पर स्वामी जी को और समय दिया गया और वे बिना रुके 20 मिनट से अधिक समय तक बोलते रहे।उनके इस भाषण को सुनकर हजारों लोग उनके शिष्य बन गए।

स्वामी विवेकानंद ने सिर्फ 30 वर्ष की आयु में ही भारत के युवा और लोगो को एक नई दिशा दे दिया। उन्होंने अपने 11 सितम्बर, 1893 में विश्व धर्म सभा में गरिमामयी व्याख्यान से यह सिद्ध कर दिया था कि हिन्दू धर्म सबसे श्रेष्ठ है और अपने में सभी धर्म को समाहित करने की क्षमता भी। उन्होंने भारत से आगे भारत के हिन्दू धर्म का परचम लहरा दिया था।

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था –

“यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेवानन्द को पढ़िए। उनमे आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।”

स्वामी जी ने वहां पर सभी लोगों को प्राचीन वैदिक सभ्यता और धर्म में निहित एकता से सबका परिचय कराया।  वे 1893 से 1896 तक अमेरिका में ही रहे।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना:

जब 1897 में वे भारत लौटे तो भारत के लोगों ने बड़े ही उत्साह के साथ उनका स्वागत किया और उनके बताये गए विचारो और धर्म के रास्ते पर चलने के लिए हजारों लोग प्रेरित हुए। स्वामी विवेकानंद ने भारत के सदियों के आलस्य को त्यागने और विश्व निर्माण में पुरे आत्मविश्वास और नए उम्मीद क साथ विश्व गुरु बनने का सन्देश दिया।  उन्होंने दलितों और महिलाओं को शिक्षित कर देश के निर्माण में सहयोग करने का भी सन्देश दिया। स्वामी विवेकानंद योगी ही नहीं बल्कि एक सच्चे देशभक्त, लेखक, विचारक, वक्त, दार्शनिक और मानवता प्रेमी थे। जब उनकी 1897 में भारत वापस आये, उसके बाद उन्होंने 01 मई, 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।दूसरों की सेवा और परोपकार को रामकृष्ण मिशन में कर्मयोग मानने वाला है रामकृष्ण मिशन जो कि हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

कहानी:

नारी का सम्मान:

स्वामी विवेकानंद कि ख्याति देश -विदेश में फ़ैल गई थी। एक बार कि बात है जब एक समारोह में विदेश गए थे तो वहां बहुत से विदशी लोग भी आये थे। वहां उनके द्वारा भाषण दिया गया जिससे वहां की एक महिला अत्यधिक प्रभावित हुईं।

समय देख कर जब महिला स्वामी जी के पास आयीं और बोलीं कि मई आपसे शादी करना चाहती हूँ ताकि मुझे आपके जैसे ही गौरवशाली पुत्र की प्राप्ति हो सके।

इस पर स्वामी जी बोले –

“क्या आप जानती हैं कि मई एक सन्यासी हूँ”, भला मैं कैसे शादी कर सकता हूँ अगर आप चाहो तो आप मुझे ही अपना बना लो। इस तरह मेरा सन्यास भी नहीं टूटेगा और आपको मेरे जैसा पुत्र भी मिल जायेगा।”

यह बात सुनते ही महिला स्वामी जी के चरणों में गिरकर क्षमा प्रार्थी होकर बोली आप धन्य हैं। आप ईश्वर के सामान हैं, जो किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते हैं।

स्वामी जी के इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें हर परिस्थिति में नारी का सम्मान करना चाहिए।

शिक्षा-दर्शन:

मैकाले द्वारा प्रतिपादित अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के स्वामी जी विरोधी थे, उनका कहना था कि इस शिक्षा  व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ कार्यालयों में बाबुओं की संख्या बढ़ने के लिए है। वह ऐसे शिक्षा व्यवस्था का समर्थन करते थे जिससे बालक का सर्वांगीण विकास हो सके। बालक को आत्म-निर्भर बनाकर अपने पैरों पर खड़े करना है।

अंग्रेजी शिक्षा के सन्दर्भ में स्वमी जी का कहना था कि यह एक निषेधात्मक शिक्षा प्रणाली है जिसमे आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हो जो कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ले और अच्छे से भाषण दे सकता हो, परन्तु वास्तव में उस शिक्षा का क्या लाभ ? जो जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं कर सकती, जो समाज में सेवा कि भावना विकसित नहीं कर सकती और जो शेर जैसा सहस पैदा नहीं कर सकती।

वे व्यावहारिक शिक्षा को मनुष्य के लिए उपयोगी मानते थे। व्यक्ति कि शिक्षा ही उसे भविष्य के लिए तैयार करती है, इसलिए शिक्षा में उन तत्वों का होना आवश्यक के जो उसके भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण हो।

स्वामी जी के शब्दों में –

“तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धांतों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है।“

स्वामी विवेकानंद देश का पुनर्निर्माण कर देश के युवाओं को लौकिक और परलौकिक दोनों ही जीवन के लिए  तैयार करना चाहते थे। स्वामी जी ने लौकिक शिक्षा के सन्दर्भ में कहा है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मनोबल बढ़े, व्यक्ति जीवन में स्वावलम्बी बने और उनकी बुद्धि का पूर्ण विकास हो। और परलौकिक शिक्षा के सन्दर्भ में उन्होंने कहा है कि शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति को और निखारे।

स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा दर्शन के बताये गए मूलभूत सिद्धांत है –

  1. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक विकास के साथ-साथ आत्मिक विकास हो सके।
  2. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक चरित्र निर्माण के साथ-साथ मन का विकास हो, उसकी बुद्धि के विकास के साथ-साथ बालक जीवन में आत्मनिर्भर बन सके।
  3. देश में बालक और बालिकाओं को सामान शिक्षा मिले।
  4. धार्मिक शिक्षा मिले जो पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण और संस्कारों द्वारा मिलनी चाहिए।
  5. शिक्षा के पाठ्यक्रम में लौकिक और परलौकिक दोनों ही विषयों में विशेष स्थान देना चाहिए।
  6. शिक्षा में गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
  7. शिक्षक और छात्र का सम्बन्ध अधिक निकट होना चाहिए।
  8. सभी वर्ग में सर्वसाधारण शिक्षा का प्रचार-प्रसार होना चाहिए।
  9. देश की आर्थिक प्रगति में तकनीकी शिक्षा का बहुत योगदान होता है इसलिए इसकी व्यवस्था की जाये।
  10. मानवीय और राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू होनी चाहिए।
  11. शिक्षा से मनुष्य विनम्र बनता है और यह ऐसी होनी चाहिए कि यह मनुष्य को जीवन में संघर्ष करने कि शक्ति दे।
  12. स्वामी जी के अनुसार व्यक्ति को अपनी रूचि को महत्त्व देना चाहिए।

मृत्यु:

स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी, सारगर्भित और हिन्दू धर्म के व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्व भर में है। उनकी 1893 के विश्व धर्म सभा में हिन्दू धर्म और भारत के लिए दिए गए भाषण को दुनिया कभी नहीं भूलेगी जिसने भारत और भारत के हिन्दू-दर्शन को विश्व में जगह दिलाई।

जीवन के अंतिम दिनों में भी वो शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या करते हुए कहते हैं –

“एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक किया क्या है।”

प्रत्यक्षदर्शियों और उनके शिष्यों के अनुसार वे अंतिम दिन 04 जुलाई, 1902 को भी ध्यान करने की अपनी दिनचर्या नहीं बदले और प्रातः 2-3 घंटे ध्यान किया और ध्यानस्थ होकर महासमाधि लेते हुए ब्रम्ह में विलीन हो गए। बेलूर मठ में ही पवित्र गंगा के तट पर चन्दन की चिता उनकी अंत्यष्टि की गयी जहाँ तट के दूसरी ओर 16 वर्ष पूर्व उनके गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस का किया गया था।

स्वामी जी के विवेकानंद के स्मृति में भारत सहित पुरे विश्व में स्वामी जी के विचारों को संदेशों को प्रचार करने के लिए 130 से भी अधिक केन्द्रो की स्थापना की।

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